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बदहाल शिक्षा व्यवस्था के जिम्मेदार

Posted On: 23 Oct, 2016 में

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बदहाल शिक्षा व्यवस्था के जिम्मेदार

हर साल की तरह इस बार भी 5 सितम्बर को पूर्व राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया गया। इस मौके पर विद्यालय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक कार्यक्रमों का आयोजन कर शिक्षकों को सम्मानि करने की परम्परा का निर्वाह किया गया। लेकिन इन कार्यक्रमों में राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों के योगदान से ज्यादा चर्चा देश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था की हुई। यूं तो मौका यह शिक्षकों के सम्मान का था लेकिन हर छोटे बड़े कार्यक्रम में वक्ताओं ने अधिकांश समय सरकारी विद्यालयों में स्तरहीन पढ़ाई के लिए अध्यापकों के लिए जमकर खरी खोटी सुनाई और अंत में शिक्षकों को तमाम नसीहतें देते हुए वक्ताओं ने अपनी वाणी को विराम दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकारी विद्यालयों में शिक्षा के गिरते स्तर के लिए शिक्षक भी जिम्मेदार हैं। लेकिन इसके साथ ही कई यक्ष प्रश्न हमारे सामने खड़े हैं कि क्या अध्यापक ही एकमात्र कारण हैं जिसकी वजह से इन विद्यालयों में गुणवत्ता परक शिक्षा छात्रों को नहीं मिल पा रही है? क्या अध्यापक प्रशासनिक बंधनों से मुक्त होकर छात्रों के शैक्षिक, मानसिक और शारीरिक उन्नयन के लिए स्वतंत्र हैं? क्या जो शिक्षक ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं उनको उचित प्रोत्साहन मिल रहा है? क्या शिक्षा व्यवस्था की बदहाली में अधिकारियों, राजनेताओं और अभिभावकों की कोई भूमिका नहीं है?

देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो चुका है। इस कानून के मुताबिक प्राथमिक स्तर पर हर 30 छात्रों पर एक शिक्षक होना चाहिए और जूनियर स्तर पर 35 छात्रों पर एक शिक्षक होना जरूरी है। प्रत्येक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक होना अनिवार्य है। लेकिन आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश और बिहार में 79 और 76 बच्चों पर एक शिक्षक उपलब्ध है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (डीआईएसई) के आंकडों के मुताबिक शिक्षा सत्र 2014-15 में देश के कुल 7.6 लाख प्राथमिक विद्यालयों में से 41.55 प्रतिशत विद्यालयों में दो शिक्षक कार्यरत हैं जबकि 11.55 प्रतिशत विद्यालय एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और 0.84 प्रतिशत विद्यालयों में एक भी शिक्षक की तैनाती नहीं है। उत्तर भारत के राज्यों की स्थिति तो खास तौर पर खराब है। शिक्षा का अधिकार कानून और उच्चतम न्यायालय ने शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से अलग रखने के निर्देश दिए हैं। लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक अफसर अपनी सुविधा के लिए अध्यापकों को कभी बीएलओ के काम में तो कभी विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षणों में लगा रहे हैं। अघोषित रूप से सैकड़ों शिक्षक कार्यालयों में भी काम कर रहे हैं। अधिकारियों का तर्क है कि इन शिक्षकों को विद्यालय समय के बाद इन कामों को पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन अब्बल तो ये शिक्षक विद्यालय समय में ही इन कामों को पूरा करते हैं। इसके अलावा अगर कोई शिक्षक अपवाद स्वरूप विद्यालय समय के बाद इन कामों को करता भी है तो क्या उसके पास विद्यालय के छात्रों के शैक्षिक उन्नयन के लिए चिंतन मनन के लिए पर्याप्त ऊर्जा और समय बचेगा।

सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों का अधिकांश समय मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था, यूनीफार्म और विभागीय सूचनाएं तैयार करने में ही निकल जाता है। इसके बाद अगर कुछ समय बचता है तो उसमें बच्चों को भी कुछ पढ़ा दिया जाता है। यूं तो अभी भी अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं है। अभिभावक विद्यालयों में बच्चों को भेजना नहीं चाहते। जो भेजते हैं उनका रूझान पढ़ाई से ज्यादा मध्यान्ह भोजन और ड्रेस आदि में रहता है। जिन अभिभावकों की रूचि बच्चों की पढ़ाई में है उनमें से अधिकांश सरकारी स्कूल का रूख ही नहीं करते।

उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में प्रथम सत्र की परीक्षाएं सम्पन्न हो चुकी हैं लेकिन अभी तक विद्यालयों में बच्चों को दी जाने वाली पाठ्य पुस्तकें नहीं पहुंची हैं। शिक्षकों को बदहाल शिक्षा व्यवस्था के लिए खरी खरी सुनाने वालों को बताना चाहिए कि किन शिक्षकों की लापरवाही की वजह से शिक्षा सत्र के पांच महीने बीत जाने के बाद भी शिक्षार्थियों को किताबें नहीं मिल सकीं। हालांकि विद्यालयों में नियमित रूप से मध्यान्ह भोजन बंट रहा है। दूध और फलों का भी वितरण करने का दावा किया जा रहा है। अधिकांश विद्यालयों में ड्रेस का वितरण हो चुका है लेकिन बच्चों के पढ़ने के लिए किताबें अभी तक नहीं पहुंची हैं। इसके बावजूद सभी को उत्तीर्ण करने के नियम के चलते सरकारी विद्यालयों के ‘मेधावी बच्चे’ पहली सत्र परीक्षा देकर उत्तीर्ण हो चुके हैं।

सोशल मीडिया में आए दिन अयोग्य शिक्षकों के वीडियो वायरल हो रहे हैं लेकिन अगर अयोग्य लोग विद्यालयों में शि़क्षण कर रहे हैंे तो इसके लिए जिम्मेदार वे शिक्षक नहीं अपितु उन्हें शिक्षक के पद पर नियुक्त करने वाली भ्रष्ट व्यवस्था है। अगर शैक्षिक स्तर के आधार पर ईमानदारी से सर्वेक्षण किया जाऐ तो ऐसे सरकारी विद्यालय ढूंढने के लिए भागीरथी प्रयास करना होगा जिसके 80 प्रतिशत बच्चों के ज्ञान का स्तर उनकी कक्षा के अनुरूप हो। ऐसे हालातों में सिर्फ शिक्षकों को दोष देने से ज्यादा आवश्यक उस शिक्षा नीति की समीक्षा है जिसने पूरी शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को पंगु बना दिया है।

विकास सक्सेना



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