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चुनाव आयोग को चुनौती

Posted On 8 May, 2016 में

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चुनाव आयोग को चुनौती

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस तरह चुनाव आयोग के नोटिस के जवाब में 19 मई (चुनाव परिणाम) के बादइंच-इंच बदला लेने की धमकी दी है। वह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है। चुनावों की नियामक संस्था के रूप में चुनाव आयोग प्रत्याशियों और राजनैतिक दलों पर नजर रखता है ताकि चुनावों में किसी प्रकार की धांधली हो। चुनावों के लिए आदर्श चुनाव आचार संहिता भी बनाई गई है। इसके उल्लंघन पर चुनाव स्थगित भी किया जा सकता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में आयोग के ढुलमुल रवैये के कारण राजनेता बेखौफ होकर आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं। मुलायम सिंह यादव, सोनिया गांधी और नरेंद्र मोदी ने चुनावों के दौरान खुले आम आचार संहिता की धज्जियां उड़ायीं लेकिन इनके खिलाफ कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूरी ही की गई। आयोग के रवैये से राजनेताओं के हौंसले इतने बुलंद हो गए हैं कि ममता बनर्जी ने नोटिस जारी करने पर निर्वाचन आयोग को खुले मंच से धमकी तक दे दी।

भारत निर्वाचन आयोग एक स्थाई संवैधानिक निकाय है जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को की गई। लेकिन चुनाव आयोग दसवें निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। दिसम्बर 1990 से दिसम्बर 1996 तक के अपने कार्यकाल के उन्होंने कई सख्त निर्णय लिए जिसके परिणामस्वरूप देश की चुनाव प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन गए। चुनाव सुधार के लिए उन्होंने राजनैतिक दलों के तीखे विरोध के बावजूद मतदाता पहचान पत्र के बिना 1995 के बाद देश में कोई चुनाव कराने का ऐलान किया। उनके इस निर्णय की वजह से कई राज्यों के चुनाव स्थगित तक करने पड़े। इसके अलावा चुनावों में प्रचार पर बेतहाशा खर्च और शराब पर नियंत्रण शेषन के प्रयासों से ही संभव हो सका। बतौर आईएएस अधिकारी अपनी नौकरी का अधिकांश हिस्सा निष्ठावान लोकसेवक के रूप में बिताने वाले शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बनते ही राजनेताओं के लिएखुखार हो गए। चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने पर उन्होंने बड़े बड़े नेताओं पर भी कार्रवाई करने में संकोच नहीं किया। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद के पुत्र का चुनाव स्थगित कर दिया था जिसके बाद गुलशेर अहमद को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन पर राज्यपाल रहते हुए अपने बेटे के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का आरोप था। इसके अलावा राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत और पूर्व मंत्री कल्पनाथ राय जैसे कद्दावर नेताओं को भी शेषन की टेड़ी नजर के सामने झुकना पड़ा। टीएन शेषन को कानून से कोई अतिरिक्त अधिकार हासिल नहीं थे। उन्होंने इच्छाशक्ति के बल पर कानून का सख्ती से पालन भर किया था।

टीएन शेषन का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से चुनाव आयोग निष्तेज होता चला गया। लोकसभा चुनाव 2014 में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बुलंदशहर में एक चुनावी रैली की दौरान धमकी भरे अंदाज में कहा था कि उनकी सरकार ने 1लाख 72हजार शिक्षा मित्रों को नियमित करने की प्रक्रिया शुरू की है। अगर उन्हें वोट नहीं दिए तो यह प्रक्रिया रोक दी जाएगी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मौलाना बुखारी से मुलाकात कर मुसलमान वोटों को बंटने से रोकने की अपील की थी। साम्प्रदायिक आधार पर भाजपा के खिलाफ मुसलमान वोटों की लामबंदी के लिए उनका यह प्रयास चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन था। इसी तरह भाजपा के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने आठवें चरण की वोटिंग के दौरान गांधी नगर में अपना वोट डालने के बाद पत्रकारों से बातचीत की जिसका कई न्यूज चैनलों ने सीधा प्रसारण भी किया। इस दौरान वे लगातार भाजपा का चुनाव चिन्ह कमल अपने हाथ में लेकर दिखाते रहे। यह जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 126(1) का उल्लंघन था। लेकिन ऐसे तमाम मामलों में आयोग की तरफ से कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई। निर्वाचन आयोग के लचर रवैये के कारण ममता बनर्जी जैसे नेताओं के हौंसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वे उसके नोटिस के जवाब में चुनाव परिणाम आने के बाद बदला लेने तक की धमकी देने लगे हैं।

कुछ दिनों पहले एक वामपंथी मित्र से चर्चा के दौरान मैंने कहा था कि फिलहाल इस देश में सशस्त्र क्रांति की कोई संभावना नहीं है क्यों कि यहां की जनता को विश्वास है कि अगर उन्होंने एक बार गलत सरकार का चुनाव कर भी लिया तो पांच साल बाद होने वाले स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में उन्हें अपनी भूल सुधार का मौका दोबारा मिलेगा। अभी तक जिस तरह से यहां शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता का हस्तांतरण होता रहा है वही इस देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। लोगों को भरोसा है कि अगर कोई संविधान और कानून का उल्लंघन करेगा तो उसको सजा देने के लिए निष्पक्ष न्यायालय मौजूद हैं। लेकिन अगर राजनेता इन संवैधानिक निकायों की प्रतिष्ठा को गिराएंगे तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ज्यादा समय तक कायम रख पाना संभव नहीं होगा। चुनाव आयोग पर भाजपा, कांग्रेस और माकपा के इशारे पर काम करने का आरोप लगाने वाली ममता बनर्जी को ध्यान रखना चाहिए कि अगर चुनाव आयोग सत्ता के प्रभाव में ही काम कर रहा होता तो बंगाल में वामपंथी सरकार को उखाड़ कर उनकी सरकार नहीं बनी होती। संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा की रक्षा करना सत्ता में बैठे लोगों का पहला दायित्व है। इसके अलावा चुनाव आयोग को भी इस तरह के प्रयासों पर सख्ती से लगाम लगानी होगी। देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए लोगों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में विश्वास बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

विकास सक्सेना

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
May 10, 2016

जय श्री राम विकास जी बहुत सही फ़रमाया चुनाव आयोग को बहुत अधिकार और चाइये और कुछ सुधारो पर अभी तक फैसला नहीं हुआ शेषण का ये देश आभारी है चुनावो में लालू ऐसे अपराधी को छूट देना गलत जाति धर्म के नाम पर वोट मग्न बंद होना चाइये ममता,लालू,नितीश,कांग्रेस केजरीवाल कुर्सी के लिए देश भी बेच दे.चुनाव आयोग बहुत अच्छा कार्य कर रहा ममता के खिलाफ कार्यवाही हो लेकिन राज्य सभा में बहुमत नहीं इसलिए सब समस्या हो मोदीजी ने व चुनाव चिन्ह एक्सीमा के बहार दिखया था उसपर जांच हुई थी.देश में बहुत सुधर होना चैये काएदे से भ्रष्टाचारी सोनिया,लालू,मुलायम,मायावती जेल में होने चाइये अच्छी भावना लेख के द्वारा.


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