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मोदी सरकार का हठयोग

Posted On: 6 Apr, 2015 Others में

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केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने दूसरी बार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर राष्ट्रपति की मुहर लगवाकर अपनी मंशा साफ कर दी है कि वह इस मामले में अपने कदम पीछे खींचने वाली नहीं है। हालांकि इस बार लागू किए गए अध्यादेश में उन नौ संशोधनों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें भूमि अधिग्रहण पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना बिल 2015 के पारित होने से पहले लोकसभा ने मंजूरी दी थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों से जुड़े लोग भी इस कानून में किए जा रहे कई संशोधनों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने इस कानून के चलते मोदी सरकार की किसान विरोधी छवि बनने की आशंका भी जताई है लेकिन ‘मेक इन इण्डिया’और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सहारे देश को तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर करने का सपना संजोए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के मामले में किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है। इस मुद्दे पर विपक्ष के हमलों का जवाब देने के लिए उन्होंने सरकार के मंत्रियों और भाजपा संगठन के पदाधिकारियों को मुखर होने की ताकीद की है।
भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनस्र्थापना में पारदर्शिता एवं उचित मुआवजा कानून 2013 में संशोधनों को जहां भाजपा और सरकार में शामिल लोग किसानों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं। बहीं कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल इन संशोधनों को किसान विरोधी बताते हुए सरकार को किसी भी तरह बख्शने को तैयार नहीं हैं। सरकार का कहना है कि पुराने कानून के कुछ प्रावधानों के चलते रक्षा और सामरिक महत्व की परियोजनाओं में अड़चने आ रही हैं। इसलिए देशहित के मद्देनजर इस कानून में संशोधन अत्यंत महत्वपूर्ण था। बीती 22मार्च को किसानों से मन की बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कानून में संशोधन को किसानों के उपयोगी बताते हुए कहा कि इससे पहले संप्रग सरकार द्वारा 2013 में बनाए गए कानून से 13कानूनों को अलग रखा गया था जिनके लिए सरकार को मनमाना मुआवजा देने की छूट थी। अब नए कानून के मुताबिक किसानों को इन कानूनों के तहत जमीन का अधिग्रहण किए जाने पर भी चार गुना मुआवजा दिया जाएगा। इसके अलावा जिस परिवार की जमीन का अधिग्रहण होगा उसके एक सदस्य को नौकरी भी दी जाएगी। कांग्रेसियों का कहना है कि रक्षा और सामरिक महत्व से जुड़ी परियोजनाओं का सवाल है तो उनके लिए किसानों की जमीन का अधिग्रहण बिना सामाजिक प्रभाव के आंकलन के 2013 के कानून में वर्णित तात्कालिकता के प्रावधान से किया जा सकता है। राजमार्ग, रेलवे, कोयला और खनिज आदि से संबंधित उपक्रमों के लिए जमीन अधिग्रहण के मामले में पुनर्वास और मुआवजे की नीति तैयार करने के लिए पिछले कानून में दिसम्बर 2015 तक का समय दिया गया था। संसद में पारित इस कानून के मुताबिक सरकार को इन 13 कानूनों को तहत जमीन का अधिग्रहण होने पर किसानों को मिलने वाले मुआवजे और उनके पुनर्वास की नीति इस साल के अंत तक तैयार करनी ही थी। सरकार अपने पूंजीपतियों और कारपोरेट सेक्टर के हक में किए गए अन्य संशोधनों को इनकी आड़ में बचाने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा भूमि देने वाले परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की बात भी जोरशोर से उठाई जा रही है। लेकिन जिस देश में दो बीघा जमीन के लिए बेटे अपने पिता और सगे भाई को मौत के घाट उतार दे रहे हैं बहां 15 सदस्यों वाले परिवार में की जमीन अधिग्रहीत होने पर किस सदस्य को नौकरी दी जाएगी इसका फैसला कौन करेगा।
भाजपा के नेता इसके अलावा अन्य जिन मुद्दों को उठाकर विपक्षी दलों के हमलों की धार को कुंद करने का प्रयास कर रहे हैं वे काफी हास्यास्पद प्रतीत हो रहे हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और भाजपा के राष्ट्रीय सचिव श्रीकांत शर्मा का कहना है कि कांग्रेस ने देश पर 67साल तक सन् 1894 में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानून के आधार पर देश पर राज किया इसलिए उसे इन संशोधनों का विरोध करने का नैतिक अधिकार नहीं है। भाजपा नेताओें का कहना है कि भूमि अधिग्रहण से पहले सामाजिक आंकलन के प्रावधानों को समाप्त करने की सिफारिश कांग्रेस के कई मुख्यमंित्रयों ने ही की है इसलिए कांग्रेस का विरोध उसके दोहरे रवैये को दिखा रहा है। लेकिन इस तरह के कुतर्क गढ़ते समय भाजपाई भूल जाते हैं कि कोयला घोटाले के समय कांग्रेस के मंत्री भी खदान आवंटन के लिए भाजपाई मुख्यमंत्रियों की सिफारिशी पत्र दिखाते घूम रहे थे। लेकिन इसका जनता पर कोई प्रभाव नहीं हुआ।
लोकसभा चुनावों के समय अपनी जनसभाओं में नरेंद्र मोदी ने गन्ना किसानों और कपास किसानों की समस्याओं को बढ़चढ़ कर उठाया था। उन्होंने कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने का लोगों से वायदा किया। उन्होंने किसानों की दुर्दशा को सरकारों की विफलता बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और लोगों से वायदा किया कि अगर उन्हें 60महीने का वक्त दिया गया तो किसानों की दशा में सुधार के लिए वह कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। लेकिन सरकार के गठन के बाद दस माह से ज्यादा का समय बीत चुका है। विभिन्न मंचों से प्रधानमंत्री औद्योगिक उत्पादन बढाने के लिए निवेश बढ़ाने की अपील करते हुए तो दिखाई दिए हैं। उद्योगों की स्थापना के लिए उचित माहौल बनाना उनकी सरकार की प्राथमिकता है ऐसा साबित करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। लेकिन कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए उनकी सरकार की तरफ से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए है। इसके उलट भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधनों के पक्ष में उतरे भाजपा के नेता यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं िकवे किसान के बेटों को सिर्फ अलाभकारी खेती करने के लिए ‘अभिशप्त’ नहीं रहने देना चाहते इसलिए तेज औद्योगिक विकास के माध्यम से वे उन्हें दूसरे कामधंधों की तरफ ले जाना चाहते हैं। भाजपा नेताओं के इस तरह के तर्कोे से साफ होता जा रहा है कि कृषि को लाभकारी व्यवसाय में तब्दील करना उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं है। कृषि से जुड़ी जनता जितनी बदहाल होगी उद्योगों को उतनी ही कम कीमत पर श्रमिक उपलब्ध होंगे। इस सिद्धांत से सभी लोग अच्छी तरह से परिचित हैं। ऐसे में भाजपा का कोई नेता किसी दिन यह भी कह सकता है कि कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने का वायदा तो महज एक चुनावी जुमला था। हमारी मंशा तो किसानों का कौशल विकास करके उन्हें उद्योगों में नौकरी दिलवाने की थी। ताकि उनका जीवन स्तर ऊंचा उठ सके।
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी बहुत उल्लेख किया। इसी प्रकार आरएसएस के अनुषांगिक संगठन के कार्यक्रम में मैंने डा. राम मनोहर लोहिया जी की तस्वीर लगी देखी। महात्मा गांधी ग्राम्य स्वराज के सबसे बड़े पैरोकारों में से एक थे। उनका साफ मानना था कि भारत के आर्थिक विकास का रास्ता साढ़े छह लाख गांवों से होकर जाता है। इसी तरह डा. लोहिया किसाना की जमीन को उसके स्वाभिमान का प्रतीक मानते थे। इन नेताओं का साफ मानना था कि उन्नत कृषि के विकास से देश के किसानों हालत सुधरेगी तभी गांव और देश तरक्की करेंगे। लेकिन औद्योगिक विकास को ही विकास का एक मात्र माडल मानने वाले विश्व बैंक के दबाव में सरकारें किसानों की जमीनों को छीनकर उनकी आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डाल रही हैं। कृषि की जमीन से न सिर्फ उसके मालिक का जीवन यापन होता है बल्कि खेतीहर मजदूर, कारीगर, कृषि उपकरणों का निर्माण और मरम्मत से जुड़े लोगों के साथ ही गांवों के छोटे मोटे दुकानदारों की आजीविका भी इसी जमीन से चलती है। जमीन के अधिग्रहण से पहले सामाजिक आंकलन से इन सभी के हकों की रक्षा हो सकेगी। संशोधन कानून में भू उपयोग बदलने की आजादी संबंधी प्रावधानों में बदलाव ने भी लोगों को संरकार की मंशा पर सवाल उठाने का मौका दिया है। इसी प्रावधान के जरिए किसानों की जमीनों का अधिग्रहण करके सरकार की मदद से उनका मनमाना उपयोग कारपोरेट जगत के लोगों ने किया है। इसी तरह परियोजना के लिए पांच साल की समय सीमा से जुड़े प्रावधान में भी बदलाव किए गए हैं।देश के समुचित विकास में औद्योगिक विकास के साथ साथ कृषि के विकास का भी महत्वपूर्ण स्थान है। साठ के दशक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के प्रयासों से हुई हरित क्रांति के फलस्वरूप अब हमने खाद्य सुरक्षा की स्थिति हासिल की है। औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में हम कहीं अपनी खाद्य सुरक्षा को खतरे में न डाल दें। इसके लिए सरकार को सावधान रहना होगा। इसके अलावा 70करोड़ से ज्यादा किसानों की आवादी वाले इस देश में अगर एक बार सरकार की किसान विरोधी छवि बन गई तो बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के अलावा 2019 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

विकास सक्सेना

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